भाषा का भ अ ष अ

 


एक विद्वान कह रहे थे कि 'अमुक' भाषा ज्ञान की भाषा है।
इस पर मुझे जो सूझा वह बताने की कोशिश करता हूं।
मान लीजिए आपको सिर्फ कन्नड़ आती है।
और चिकन बिरयानी बनाना भी आता है।
आप बोलकर और लिखकर चिकन बिरयानी बनाने की विधि बता सकते हैं।
फिर आप बस्तर में रहने लगते हैं। और हलबी भाषा सीख जाते हैं। तब आप हलबी में चिकन बिरयानी बनाने की विधि तो नहीं सीखेंगे। वह तो आपको आती है।
भाषा बदलने से ज्ञान तो नहीं बदलेगा।
फिर आप मलयालम, तेलुगू, अरबी, गोंडी, अंग्रेज़ी आदि जितनी भी भाषा सीखते जाएँगे। सब में चिकन बिरयानी बनाने की विधि लिखना बताना भी सीख ही जाएंगे। सीखते जाएँगे।
इसलिए कोई भी भाषा किसी दूसरी भाषा से श्रेष्ठ या कमतर नहीं हैं। वे सिर्फ हैं कुदरत से इंसान को मिले अनूठे तोहफे की तरह। अगर कोई किसी भाषा को ज्ञान की भाषा कहता है तो उसे उसी भाषा को ज्ञान के अलावा अज्ञान, अंधविश्वास, विश्वास, कूड़ा, कचरा, अनुभव, विचार, इज़्म आदि की भाषा भी कहना पडेगा।
क्योंकि सब कुछ भाषा में ही है।

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