समझ की समझ
"समझ और कौशल ठहरी हुई चीजें नहीं हैं। बच्चों में तो यह वयस्कों से ज्यादा निरन्तर और गतिशील है।
-शेपचिल्ली किताब के सरल रेखाचित्र देखकर एक बच्चा बोला, "रहने दो मुझे ड्राइंग नहीं आती।" पता नहीं उसे किसने सिखा दिया कि पहले सीखना होगा फिर क्रियान्वयन! जो वह जानता होगा, उसी से अनभिज्ञ है। मसलन पढना! यह तो पढकर ही सीखा होगा!
-स्कूल की कक्षा और पढ़ने के स्तर के मामले में तो तरह-तरह से यही कहा जाता है, "अभी ये इतना नहीं पढ़ पायेगी।" "नहीं ये तो बहुत कम है।" "6 साल के बच्चे के लिए किताब बताइये।"
इन बातों से ऐसा लगता है जैसे समझ और कौशल कोई मंजिल है जहाँ आकर बच्चा ठहर गया है। फिक्स हो गया है। पांचवी का बच्चा, पांचवीं के साथ। तीसरी का तीसरी के साथ।
यह सीखने के संस्थानीकरण का नतीजा है।
इसने इंसानों पर डिग्री, उम्र, कक्षा, स्तर, विशेषज्ञता और नादानी के इतने ठप्पे लगा दिए हैं कि उनको हटाकर देखना मुश्किल है?
ना खुद को देखना , ना बच्चे को!

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