प्रकाशित प्रतिष्ठा!
किसी की रचना छपे, अखबार में या पत्रिका में! तो वो यहाँ बताते हुए लिखता है, मेरी रचना 'प्रतिष्ठित' पत्रिका ............ में छपी है।
ये जो प्रतिष्ठित है, वो कुछ ऐसा है कि आपको छापा इसलिए प्रतिष्ठित हो गई। नहीं तो एवेई तो थी ही। लेने देन का कारोबार हो जैसे, "आप मुझे छापो मैं आपको 'प्रतिष्ठित' का तमगा दूंगा।"
खुद को छपा देखने की भूख बड़ी मारक है। वह कागज, प्रिंट, निरन्तरता, पाठक संख्या, सम्पादक, स्तर, कुछ भी नहीं देखती। छपे हुए का मानदेय चाहना तो दिवास्वप्न जैसा है। लोग छपने के लिए पैसा तक देने को तैयार हैं,
"बभुक्षति किं न करोति पापम!
जैसे बटन दबाते ही वल्ब जलता है, वैसे ही छपते ही 'प्रतिष्ठित' आलोकित हो जाता है!
आपकी और आपकी भाषा की प्रतिष्ठा का क्या?
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