बधाई; कि आप शिक्षक हैं!
अच्छा है कि शिक्षक के पेशे का हम इतना सम्मान करते हैं।
हमारे आसपास लोग तरह तरह के काम करते हैं। जैसे लोहार, सुतार, कुम्हार और तरह-तरह के शिल्पी। किसान और पशुपालक। मुझे नहीं पता कि इनमें से किसी का कोई दिवस है कि नहींॽ औद्योगीकरण से पहले सारी दुनिया में आर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ यही लोग थे।
गायिका, संगीतकार, अभिनेत्री, कवि, कहानीकार, उपन्यासकार बगैरा का भी कोई दिन नहीं है।
शिक्षक दिवस की मुखालफत में नहीं, बल्कि यूँ ही सोचना चाहिए कि हम शिक्षक के पेशे को अन्य कामों के ऊपर इतनी तरजीह क्यों देते हैंॽ
स्कूली शिक्षा के लोककव्यापीकरण से पहले से हम गुरु पूर्णिमा मनाते रहे हैं। पर यह गुरु दुनियावी कम और अध्यात्मिक धार्मिक अधिक थे/ हैं। शिक्षक दिवस आज़ादी के बाद कभी शुरू हुआ होगा।
स्कूल और कॉलेजों के आने से यह हुआ कि ज्ञान का संस्थानीकरण होने लगा। स्कूल और कॉलेज से मिले ज्ञान और कौशल को ही प्रामाणिक माना जाने लगा। वो सीखने की एकमात्र जगह के रूप में रूढ़ होते गये। और अब तो आप क्या-क्या जानते हैं यह जॉंचने के लिए यही पूछा जाता है कि आपने क्या पढ़ाई की हैॽ
आप इसे अच्छी समझें या खराब, स्कूल और शिक्षक इसी व्यवस्था की रीढ़ हैं।
वास्तव में तो हम बहुत से कौशल और ज्ञान स्कूल के बाहर से अर्जित करते हैं। और चूंकि वह अवलोकन, काम और अनुभव की जमीन पर बनते हैं, इसलिए टिकाऊ भी होते हैं।
पर स्कूल को ही सीखने की अधिकृत जगह मानकर और ऐसा दर्शाकर हमने सीखने की संभावनाओं को सीमित कर लिया है। खासकर अपने बच्चों के लिए।
हमें अपने बच्चों को यह भी बताना चाहिए कि स्कूल के बाहर भी अपने ऑंख, कान खुले रखना चाहिए। इससे स्कूल में सीखना भी आसान हो सकेगा। शिक्षकों को भी यह करना चाहिए।
इसे शिक्षक दिवस की बधाई तरह पढ़ियेगा।
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