अलेखक
आज इकतारा आठ साल का हुआ।
मैं इसमें से छह साल इकतारा में रहा।
इन छह सालों में मैंने खूब लिखा। औसतन पाँच छह रचनाएँ हर महीने रिजेक्ट हुई होंगी। मतलब छह साल में लगभग चार सौ रचनाएँ !
और ऐसा इसलिए हो पाया कि मैं अन्दर का आदमी था। इसलिए जल्दी जवाब मिलता था और अगली रचना भी जल्दी लिखा जाती थी।
प्रकाशन गृह से बाहर के लेखक के लिए ऐसी उपलब्धि अर्जित करना नामुनकिन है।
अगर इसका लेखा जोखा रखता तो गिनीज बुक में आ सकता था।
मैं असमंजस में हूँ कि इसका श्रेय शशि को दूँ कि सुशील को?
इस बीच कुछ कविताएं भी लिखी। पर सुशील और प्रभात इतनी अच्छी कविताएं लिखते हैं कि आत्म अस्वीकृत करना बेहतर समझा।
रिजेक्शन की भारी तादाद के कारण जो छप सका वह ठीक-ठाक ही था। इसलिए कुछ लोगों ने मुझे भी लेखक समझ लिया। उम्मीद है इसे पढकर मुझे गलत समझने वाले अपनी गलती सुधार लेंगे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें