साबित करो कि सामान्य हो!


 एक कहानी सुनाता हूँ। 

एक चौदह साल की मूक वधिर लड़की है। 

स्कूल में उन बच्चों के साथ पढ़ती है जो मूक वधिर नहीं हैं। उसके पिता सब्जी का ठेला लगाते हैं। उसकी कोई सहेली नहीं है। वो कक्षा में सबसे पीछे बैठती है। उसके अध्यापक लोग भी उस पर कोई ध्यान नहीं देते। 

मूक वधिर लड़की एक दिन स्कूल की लड़कियों के साथ पिकनिक पर जाती है। पिकनिक नदी किनारे है। मूक वधिर लड़की इनसे दूर नदी किनारे उदास बैठी है। सब लड़कियाँ मज़े कर रही हैं। उनकी गेंद उछलती हुई आकर नदी में गिर जाती है। एक लड़की गेंद लेने नदी में उतरती है और पानी में डूबने लगती है। मूक वधिर लड़की उसे डूबने से बचाती है। 

उस दिन से वह स्कूल में सबके ध्यान का केन्द्र बन जाती है। सारा शहर उसकी तारीफ़ करता है।


यह एक पाठ्यपुस्तक से बरामद हुई रचना है।

अन्यथा सक्षम बच्चों को पाठ्य्पुस्तकों और बच्चों  के साहित्ये में लाने का सुपरहिट फार्मूला है यह।


इस लिजलिजी चीज़ की बुनावट समझिए।


यह कहती है कि जो मूक वधिर नहीं है, वो सबके ध्यान और दोस्ती के स्वावभाविक केन्द्र  हैं। पर मूक वधिर लड़की जैसी है वैसी स्वीकार नहीं है।

 जो देख नहीं सकते, सुन और बोल नहीं सकते। उनको बाकी लोगों का घ्यान और दोस्ती हासिल करने के लिए अपने आपको साबित करना पड़ेगा। जैसा इस कहानी की मूक वधिर लड़की ने किया।

 सिर्फ मूक वधिर लड़की ही नहीं उन सबको खुद को साबित करना होगा जिन्हें औरों से कुछ कम हासिल है। जो वचित हैं। 

गरीब बच्चे को अपने आपको ईमानदार साबित करने के लिए अमीर का खोया हुआ बटुआ वापिस करना होगा।।

जो गरीब नहीं हैं उनकी ईमानदारी स्वियंसिध्द है।


जो मुसलमान है उसे अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए अपने बच्चे को जन्माष्टमी की झाँकी में किसन कन्हैया बनाना होगा। बाकी सबकी राष्ट्राभक्ति स्वयंसिध्द है।

ऐसी कहानियों से कुछ नहीं होता। जैसे ठूसकर खाए को डकार आती है, वैसा कुछ होता हो तो, पता नहीं !


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