गणतंत्र अब!
गणतंत्र दिवस की सुबह हमेशा से ठिठुराने वाली रही है।
बचपन में स्वेटर तक नहीं होती थी। जूते मौजे तो आकाश कुसुम जैसे थे।
फिर भी देशभक्ति के गीत रोमांच से भर देते थे। दिन चढ़ने के साथ देश के सूरज की धूप तीखी होकर ठण्ड हर लेती थी।
उस समय देश, राष्ट्र, लोकतंत्र, संविधान कुछ पता नहीं था। स्कूल ने जनगण मन और इतिहास, भूगोल पढ़ाकर जितना बताया, बस उतना ही पता था।
जब होश संभाला तो देखा कि गणतंत्र पर लोक की नहीं सेना, हथियार और हिंसा करके अर्जित किए शौर्य की महिमा गाई जाती है। देशभक्ति का मतलब कथित शत्रु देश के खिलाफ नफरत पैदा करना और उसे चुनौती देना ही रह गया है। उसका अपने देश के लोगों के साथ बराबरी और बंधुत्व से कोई सरोकार नहीं है।
फिल्मों के उदाहरण से कहें तो 'रंग दे बसंती' से नहीं 'गदर' से देशभक्ति जाहिर होती है!
कई बार बंधुत्व, न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्षता को पलीता लगाकर ऊंची हैसियत पाए लोग झण्डावदन करते हैं।
वे जब भाषणों में लोकतंत्र और गणतंत्र की बात करते हैं तो लगता है भेड़िये अहिंसा का जाप कर रहे हैं
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