क्लिक क्लिक क्लिक
हम कई बार कोई खूबसूरत चिड़िया देखते हैं। कोई झर-झर झरता झरना या सिर उठाए पहाड़। खुलकर खिले फूल, कोई बहुत बूढ़ा इंसान या बोझा ढोती स्त्री।
और झट से फोटो ले लेते हैं।
झट से क्लिक नहीं करते तो दृश्य का आनन्द और उससे उपजी सम्वेदना लम्बे समय तक मन में रहते। अगर मन में कुछ देर ठहरते तो किसी भी और रूप में खुलते, खिलते, फैलते। सम्वेदनाओं को विस्तार देते।
क्लिक करके हम इनसे तुरन्त मुक्त हो जाते हैं। ये हमारी सोच का हिस्सा नहीं रह पाते। कुछ हद तक हम उस दृश्य के अकेले मालिक की तरह हो जाते हैं। और मालिक भी नहीं शायद! बहुधा तो उस तस्वीर को दोबारा देखते भी नहीं!
और फिर वह दृश्य भी नहीं रहता। हम ही हम रह जाते हैं। अकेले।
कभी इस पर सोचना!
कभी किसी दृश्य को बिना क्लिक किए याद करने की सोचना!
समझ आयेगा कि कैमरे की सुलभता ने आपसे क्या-क्या छीन लिया है?
और जिसको फोटो लेते रहना है, लेते रहें। अपन को क्या!

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