पढ़ना; ज़रा सोचना!

 

 

                                               


इंसान के एक बच्‍चे के समक्ष सीखने के लिए तमाम चीज़ें होती हैं। इनमें से कुछ साइकिल चलाना, तैरना, पेड़ पर चढ़ना, गाना, किसी वाद्य यंत्र को बजाने में महारत हासिल करना आदि हैं। इनमें सबसे न्‍यूनतम और बेहद ज़रूरी है, पढ़ना सीखना। बच्‍चे के चार साल का होते-न-होते उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्‍य यही होता है। इसी के लिए तमाम प्राथमिक शालायें, हजारों स्‍वयंसेवी संस्‍थायें, ढेर सारे प्रकाशक और पढ़ना सिखाने के नित नूतन नवाचार मौज़ूद हैं। बावज़ूद इसके हमारी शिक्षा की मुख्‍य समस्‍या आज भी बच्‍चों का पढ़ना नहीं सीख पाना या देरी से पढ़ना सीखना है।

थोड़ा और गहराई से सोचें तो जिन्‍हें हम इस रूप में जानते हैं कि वे पढ़ना जानते हैं, वे भी कहाँ कायदे से पढ़ना सीखे होते हैं।

कृष्‍ण कुमार की किताब पढ़ना, जरा सोचना हमें पढ़ने के इन्‍ही विविध पहलुओं की पड़ताल में ले जाती है। बल्कि ज्‍यादा सही ये कहना होगा कि उस कुचक्र से साक्षात कराती है जिसमें पढ़ना, पढ़कर समझना और पढ़ने की आदत का विकास फँसकर रह गए हैं। इसलिए यह किताब सिर्फ बच्‍चों के पढ़ना सीखने के बारे में नहीं है। बल्कि हमारे समाज में पढ़ने की स्थिति के बारे में है। इस दायरे में हम सब आते हैं।  

पढ़ना, जरा सोचना, तक्षशिला एजुकेशन सोसायटी के बाल साहित्‍य और कला केन्‍द्र इकतारा से प्रकाशित हुई है। इस किताब की भूमिका में कृष्‍ण कुमार कहते हैं,  जो पढ़ नहीं सकते, उन्हें अनपढ़ कहकर हम ऐसे लोगों के लिए कोई शब्द नहीं छोड़ते जो पढ़ सकते हैं मगर पढ़ते नहीं. उनसे भी बड़ी संख्या में वे लोग हैं जो पढ़ते हैं, पर समझते नहीं।”

इस किताब की यात्रा हमें उन पहलुओं की पड़ताल में ले जाती है जो पढ़कर नहीं समझ रहे और पढ़ना जान रहे नहीं पढ़ने वाले समाज के बनने के केंद्र में हैं।

पहले अध्‍याय पढ़ना, बचपन और साहित्‍य में वे कहते हैं कि हम पढ़ते हुए लिखे का अर्थ तलाशते और तराशते हुए चलते हैं। हम जो अर्थ तलाशते हैं वह हमारा ही दिया हुआ होता है। कई बार साहित्‍य पढ़ते हुए हमें लगता है कि कोई बात लेखक ने हमारे लिए ही लिखी है। ऐसी बात पढ़कर हमें खास तरह का सुख या सन्‍तोष मिलता है। यदि कोई लेखक हमें ऐसा सुख देता है तो हम उसकी रचनायें ढूंढ ढूंढ कर पढ़ते हैं। यदि बच्‍चों को भी ऐसी रचनाएं मिलें तो इस खास सुख की चाह उनमें बचपन से ही पैदा हो जायेगी। जो लेखक बच्‍चों को सिखाने के लिए लिखते हैं वे ऐसी कृति नहीं रच पाते जिसे बच्‍चे बार-बार पढ़ें।

जो बात उन्‍होंने इस लेख में नहीं कही, उसे भी इस विवरण से समझा जा सकता है। स्‍कूल में चलने वाले पढ़ने के क्रियाकलाप समझें। पाठयपुस्‍तकों को गहराई से देखें तो हमें ये समझते देर नहीं लगेगी कि हम पढ़ने का उद्देश्‍य समझने में चूक कर रहे हैं।

अगले अध्‍याय में वे इसी के विस्‍तार में जाते हुए बताते हैं कि पढ़ना और पढ़ाई दो अलग-अलग बात हैं। पढ़ाई का मतलब परीक्षा की तैयारी के लिए पढ़ना है। तैयारी से आशय बिना सोच विचार में समय बर्बाद किए पूछे गए प्रश्‍न का उत्‍तर लिख सकने की सामर्थ्‍य विकसित करना है। ऐसी सामर्थ्‍य बोल-बोल कर याद करने और बार-बार लिखने का अभ्‍यास करने से आती है। इस खुलासे से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि पढ़ाई में पढ़ना महज़ एक प्रारम्भिक क्रिया है। असली काम इसके बाद चालू होता है, जिसे मेहनत करना कहते हैं। यह बात पढ़ना और पढ़ाई को साफ तौर से अलग कर देती है।

पढ़ाई के लिए कोई प्रेमचन्‍द की कहानी या उपन्‍यास पढ़ेगा तो इसकी बहुत कम संभावना है कि वो उनकी और रचनायें पढ़ने के लिए प्रेरित हो सके। इसलिए हमें कभी ऐसे कथन भी सुनने में आ सकते हैं कि मेरा बेटा पढ़ाई में अच्‍छा है पर पढ़ता नहीं है। 

कृष्‍णकुमार पढ़े लिखे लोगों में पढ़ने की रुचि और आदत के अभाव की जड़ें वाचन की परम्‍परा और पाठ की भूमिका में भी देखते हैं। वाचन यानि बोलकर पढ़ना या किसी को सुनाने के लिए पढ़ना कक्षा संचालन की एक मजबूत परम्‍परा बन चुका है। वाचन का सम्‍बंध पाठ से है, दोनों ही शब्‍द याद दिलाते हैं कि पहले के समय में पढ़ना उतना आम नहीं था जितना आज माना जाने लगा है। पाठ्यपुस्‍तक पाठों का संग्रह है। इसमें जो पाठ हैं उनके अर्थ पूर्व निश्चित हैं। पाठक उसी अर्थ को जानकर सफल हो सकता है। इस तरह पाठयपुस्‍तक में खुद अर्थ ग्रहण करने की गुंजाइश का अभाव पढ़ने की मीमांसा को काफी सीमित कर देता है। पाठ की परिपाटी पाठक को अपनी निजी कल्‍पना से कोई बिम्‍ब या अर्थ ग्रहण करने की छूट नहीं देती। इसलिए वाचन पर जोर दिया जाता है।

वाचन की परिपाटी हमें एक ऐसे अतीत की याद दिलाती है जब पढ़ने वाले बहुत कम थे और उनकी हैसियत दूसरे लोगों से अधिक थी। खेद है कि यही परिपाटी अब तक चली आती है।

पढ़ने के माहौल पर बात करते हुए कृष्‍ण कुमार आशंका जाहिर करते हैं कि जिस स्‍कूल में पढ़ाई ज़ोरों  पर होती है, वहाँ पढ़ने का माहौल न के बराबर होता होगा। ऐसा वे पढ़ाई में लगने वाले अभ्‍यास और मेहनत का उल्‍लेख करते हुए कहते हैं। वे सुझाते हैं कि अच्‍छा बाल साहित्‍य बच्‍चों के जीवन में पढ़ाई के वर्चस्‍व को चुनौती दे सकता है। ऐसा माहौल पढ़ने का माहौल होगा जिसे कोई स्‍कूल खुद भी बना सकता है। पर इसके लिए उसे उस माहौल से जूझना होगा जो समूची शिक्षा व्‍यवस्‍था के साथ-साथ समाज में भी फैला हुआ है।

किताब में कृष्‍णकुमार ने अर्थ कहाँ से आता है का बहुत सरल और सटीक विवेचन किया है। किसी कहानी को पढ़ते हुए जब हम स्‍वयं उसमें जा पहुंचते हैं, शामिल हो जाते हैं तो उसका अर्थ हम तक आता है। ये कहानी को अर्थ देने में हमारी सक्रिय भूमिका के कारण होता है। पढ़ने में इस तरह के जुड़ाव को बनाने के लिए वे अच्‍छे बाल साहित्‍य की भूमिका को प्रमुख मानते हैं। किताब में इस पर एक अलग अध्‍याय है कि हम अच्‍छा बाल साहित्‍य किसे कहें।

यह किताब हमें डिजिटल माध्‍यम से पढ़ने के बारे में भी सचेत करती है। हालांकि डिजिटल माध्‍यम से पढ़ने और किताब से पढ़ने में अन्‍तर पर बहुत कम अनुसंधान हुए हैं। इस किताब में कृष्‍णकुमार अमरीकी संज्ञानविद मेरिएन वुल्‍फ के हवाले से बताते हैं कि डिजिटल माध्‍यमों के आदी विद्यार्थियों में समीक्षाई सोच को सम्‍भव बनाने वाली गहन रूप से पढ़ने की आदत को विकसित करना मुश्किल पाया गया है। यही मुश्किल कहानी के पात्र से तादाम्‍य बनाने या उसके अनुभव से जुड़ने की क्षमता के बारे में भी निकलकर आई है। मेरियन वुल्‍फ सूचना और जानकारी के लिए डिजिटल माध्‍यमों पर पढ़ने तथा साहित्यिक अनुभव और संज्ञानात्‍मक विकास के लिए किताबों जैसे पारम्‍परिक माध्‍यम की सिफारिश करते हैं।

इसे पढ़ते हुए मुझे वाट्स एप और ट्विटर जैसे मंच याद आए। यहाँ पढ़ने में आने वाली बातों में झूठ और फेक न्‍यूज का एक बड़ा हिस्‍सा है। ऐसा लगता है कि लोग किसी भी बात के सन्‍दर्भ, अन्‍य पहलुओं और उसकी गहराई में जाए बिना उसे प्रसारित करने में जुट जाते हैं। इससे देश का सामाजिक राजनैतिक माहौल लगातार खराब होता गया है। किताब से पढ़ने और इन मंचों पर पढ़ने के इस अन्‍तर पर भी अध्‍ययन होने चाहिए।

किताब में चन्‍द्रमोहन कुलकर्णी के बनाए माटी के शिल्‍प इस अहसास को और घनीभूत बनाते हैं कि यह धीरे-धीरे और सोचते हुए पढ़ने की किताब है। फोंट बहुत सादे और सुगम हैं। दो पंक्तियों के बीच रखी गई दूरी इतनी पर्याप्‍त है कि किसी भी पंक्ति का छूटना या पढ़ते-पढ़ते नज़रों का ऊपर या नीचे चले जाना लगभग नामुमकिन है।

यह किताब पढ़ने के बारे में सोचने पर है। पर पढ़ने के विविध पहलुओं को एकमुश्‍त हमारे सामने रखने के कारण इसका प्रभाव इससे आगे भी जाता है। हम इनको आपस में जोड़कर देख सकते हैं। इनके कारण और प्रभाव समझ सकते हैं। और अगर शिक्षा और बच्‍चों से सीधे जुड़े हैं तो पढ़ने की पहल के लिए रास्‍ते भी सोच सकते हैं।

 

 

 

   

 

 

 

 

  

 

  

   

 

 

 

 

  


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