अकबर की भाषा, जोधा की भाषा

 




अकबर को गुस्सा आता है। जोधा क्रोधित होती है।
अकबर को खुशी होती है। जोधा प्रसन्न् होती हैं।
अकबर के पास दिल है, जो नाजुक है।
जोधा के पास ह्रदय है, जो कोमल है।
अकबर जोधा से गुफ्तगू करते हैं, जोधा भी अकबर से वार्तालाप करती हैं।
दोनों एक दूसरे से अपनी अपनी भाषा में बात करते हैं। और दोनों एक दूसरे की बात समझते हैं।
इससे पटकथा लेखक क्या यह समझाना चाहता था कि उस समय के भारत में हिन्दू और मुसलमान अलग−अलग भाषा बोलते थे?
और अपनी−अपनी भाषा के प्रति लोगों के आग्रह इतने तगड़े थे कि जिन्दगी भर साथ रहकर भी उनकी भाषा पर एक−दूसरे का असर नहीं होता था?

या वह हिन्दू या मुस्लिम होने की पहचान के रूप में भाषा को स्थापित कर रहा था?

या वह मूर्ख था? और भाषाओं के बारे में कुछ भी नही जानता था!

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