पैसे कितने मिले?
जब कोई लिखता है कि उसे "अमुक" पुरस्कार मिला है।
तो सबसे पहले मेरा मन उससे यह पूछने का करता है कि पैसे कितने मिले?
थोड़ा और खोदने का मन करता है कि जिस रचना/किताब के लिए ईनाम मिला है उसके लिए छापक से मानदेय मिला था कि नहीं? मुफ्त में छपवाई थी? कि छपवाने के पैसे देने पडे थे?
नाममात्र का पुरस्कार लेखक के लिए नहीं है!
वह ऐसा पुरस्कार है जो आयोजक खुद को दे रहे हैं। खुद का ढिंढोरा पीट रहे हैं!
कितनी बुरी बात है कि कोई रचनाकार कहे कि मुझे इस महीने अमुक पुरस्कार मिला है, लेने जाने में दो दिन और आठ हजार लग गए। यह बुरी बात ही सच्ची बात है।
पर कोई नहीं कहता। कौन कहेगा कि अपनी मरवाकर आया हूं।
इसके बदले वह कहता है, मुझे अमुक पुरस्कार मिला।
सब कहते हैं, वाह, बधाई, आपकी प्रतिभा का प्रतिदान है, आपको तो मिलना ही था।
कितना नकली है ना यह सब?
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