अंग्रेजी की चर्बी में...
क़िताबों की दुकान पर कई ऐसे बडे भी आते हैं, जो बच्चों को ये तय ही नहीं करने देते कि वे कौन सी किताब पढ़ें। उनके बच्चे रोते गिड़गिड़ाते रहते हैं, पर वे उन्हें अपनी पसन्द की 50 रुपए की किताब दिलाने के बजाय 100 रुपए का पिज्जा खिला देने को पैसे का सदुपयोग समझते हैं।
इसके लिए वे जो तर्क देते हैं, सुनें-
नहीं बेटी ये हिन्दी की किताब है, इससे आपकी इंगलिश खराब हो जाएगी।
इसमें तो छोटी सी कहानी है, आप आधे घण्टे में पढ़ लेंगे।
फिर किताब फालतू पड़ी रहेगी।
इसमें जो बनाने को दिया है, आपसे नहीं बनेगा। बगैरा।
शिक्षा, भाषा, बचपन, सीखना आदि वे मसले हैं, जिन पर इन बड़ों की कोई समझ नहीं है।।
बेसाख्ता कृष्णकुमार याद आते हैं। वे कहते हैं,
‘अंग्रेजी वह चर्बी है जिसके नीचे इस वर्ग ने अपना बौध्दिक दीवालियापन छुपा रखा है।‘
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