लंका दहन के बाद...
'दहन' लंका दहन के बाद की कहानी है।
सुनी-पढी कहानियों में भी विस्तार के कुछ सिरे हो सकते हैं! हनुमान ने लंका जलाई, यह तो सबने पढा है।
क्या किसीने यह भी पढा है कि वहाँ कौन कौन रहते होंगे? आग में किस किसके घर जले होंगे? इस आग से कौन-से काम धंधे प्रभावित हुए होंगे? वहाँ के बच्चे, बूढे किस यातना से गुजरे होंगे?
पौराणिक साहित्य को ईश्वर की लीला मानकर बाँचने वाले यह सब नहीं सोच सकते!
पर ऐसा भी सोचा जा सकता है! यह कोई धर्मविरोधी काम नहीं है। इससे ना धर्म की हानि होती है ना राष्ट्र की। इससे तो रुतबा और ईमान ही बुलंद होता है।
दहन लंका में रहने वाली एक किशोरी वल्लरी की कहानी है। उसकी माँ अशोक वाटिका में सीताजी की परिचारिका है। वल्लरी भी सीता से मिली है, और उनके गुणों की प्रशंसक है। आग में इस वल्लरी का घर, नाव और मछली पकडने का जाल भी जल जाता है।
'दहन' राजनेता और साहित्यकार मीनाक्षी नटराजन Meenakshi Natarajan की लिखी कहानी है।

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