मुर्दे का वज़न
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बुआ का गांव नर्मदा पर बने बांध में डूबा हुआ है।
बुआ मर चुकी।
फूफा भी मर चुके।
आज यादों में डुबकी लगाई तो फूफा की शवयात्रा याद आ गई।
मैं हाईस्कूल में था। फूफा की खबर आई तो मुझे उनके गांव भिजा दिया। देर शाम पहुंचा। अगले दिन क्रियाकर्म था। पता चला फूफा की अन्तिम इच्छा नर्मदा किनारे दाग देने की थी। नर्मदा गांव से 18 किलोमीटर दूर थी।
'गांव डूबने वाला है' का पत्थर सबके गले में था। निपट गरीबों के इस गांव में एक भी ट्रेक्टर नहीं था। पैदल ही जाना था।
शवयात्रा निकली तो चार पांच किलोमीटर बाद ही लोग थकने लगे। कंधे बदलने लगे और इसके लिए तू तू मैं मैं भी होने लगी। अर्थी जमीन पर रखकर सुस्ताने के लिए रुका जाने लगा। जमीन पर रखना, पटकने' में बदल गया। राम नाम सत्य करते लोग राम राम करने लगे।
फूफाजी अब सिर्फ वजन थे। अपने भाइयों, बेटों, दोस्तों सबके लिए असहनीय बोझ। कल का दुख थकान और परेशानी में बदल गया था। यात्रा अब इस बोझ से मुक्ति के लिए थी।
किसी तरह दोपहर तीन बजे नर्मदा किनारे लगे। सबको तेज भूख लगी थी। जाते ही नुक्ती और सेंव बनने लगी। फूफा में आग लगाते ही पंचलकडी भी दे दी गई। और सब खाने पर टूट पडे।
उस दिन जाना कि मरने के बाद के काम कठिन हो जाएं तो इंसान का लगाव बन्दर के लगाव से भी कम समय में खत्म हो सकता है!
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