लुगदी: मेरे लिए
लुगदी क्या है, नहीं पता!
बस यह साझा कर रहा हूँ कि एक सम्पादक के रूप में मैं जिन रचनाओं को बच्चों के लिए अनुपयुक्त समझता हूँ उनमें इनमें से कुछ होता है-
-रोचकता का अभाव।
-भाषा में उदारता की जगह मानकता की झलक।
-बच्चों की कल्पना और विवेक पर अविश्वास।
-सिखाने का जाहिर आग्रह।
-सम्बोधन का समूह वाचक संज्ञा (प्यारे बच्चों ) होना।
-यथास्थिति का पोषण, और उसके प्रति आलोचनात्मक न होना। (जैसे, परिवार, स्कूल, शिक्षा, संस्कृति, देश, माँ, पिता, जैसे हैं, वैसे ही अच्छे हैं।)
-घिस चुके बिम्बों का प्रयोग।
-भाषा, कहन, विषय आदि किसी में भी नयापन का न होना।
- वंचित, अन्यथा सक्षम, वर्ग के प्रति दयाभाव।
-लिंग, जाति, धर्म, राष्ट्र आधारित भेदभाव पूर्ण विचारों का पोषण।
-कल्पना पर अविश्वास (अंतिम वाक्य .... ने पाया कि वह तो सपना देख रहा था।)
-पशु पक्षियों पर इंसानी अवगुणों का आरोपण। (कौआ चालाक पक्षी है।)
-अकारण पशु पक्षियों का चित्रण। (हाथी के स्वभाव के बारे में कुछ कहना हो तो कहानी, कविता में हाथी आए। वह बस्ता लेकर स्कूल न जाए!)
-कोष्ठक में दी समझदारी से संक्रमित रचना (यह रचना बच्चों को पसन्द आएगी। बडों को भले न आए।)
(सफाई- जिसको जैसा लिखना हो लिखे। क्योंकि जो जैसी दुनिया में यकीन करता है, वैसी बातें उसके लेखन में स्वतः आ जाती हैं। इनको कोशिश करके शामिल करने पर दिख जाता है कि कोशिश की है। और यह कि मैं किसी का लिखा छपवाने की हैसियत में नहीं हूँ।)

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