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दोस्त के जूते [ उत्तरप्रदेश में कक्षा 3 की किताब 'वीणा' में शामिल]

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काम की चीज़

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आम के बगीचे में

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  कहानी - आम के बगीचे में  बकरी चराते-चराते राशिद ने देखा। आम के बगीचे में माली बाबा नहीं हैं। वो चुपके से बगीचे में घुसा और आम के सबसे ऊँ चे पेड़ पर चढ़ गया। राशिद आम तोड़ ही रहा था कि जाने किधर से माली बाबा आ टपके। दूर भी नहीं , आम के ठीक नीचे। राशिद कायदे से उतरता तो पकड़े जाने का खतरा था। उसने तय किया कि वो सीधे जमीन पर कूदेगा और दौड़ लगा देगा। माली बाबा ने राशिद को देख लिया था। राशिद जिधर से भी कूदने की कोशिश करता , माली बाबा भी फुर्ती से उसी तरफ हो जाते। राशिद कूदने की जुगत में बन्‍दर की तरह इस डाल से उस डाल पर कूदता रहा। हर बार माली बाबा भी इस पोजीशन में होते कि राशिद नीचे कूदे तो सीधे उनकी गिरफ्त में ही जाये। राशिद अब घबराने लगा था कि आज तो जमकर पिटाई होगी। कुछ देर तक यही आँख-मिचौनी चलती रही। माली बाबा ठहरे बुजुर्ग आदमी। इस कसरत से वे थक गए और एक जगह खड़े होकर हाँफने लगे। राशिद ने भी सोचा- यही मौका है। वो माली बाबा जहाँ थे , उसकी विपरीत दिशा में कूदा। पर यह क्‍या ? माली बाबा ने भी फुर्ती से जगह बदली और राशिद सीधा उनके हाथों में गिरा। वे राशिद को गोद में लिए लि...

घोड़ा

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पढ़ना; ज़रा सोचना!

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                                                      इंसान के एक बच्‍चे के समक्ष सीखने के लिए तमाम चीज़ें होती हैं। इनमें से कुछ साइकिल चलाना , तैरना , पेड़ पर चढ़ना , गाना , किसी वाद्य यंत्र को बजाने में महारत हासिल करना आदि हैं। इनमें सबसे न्‍यूनतम और बेहद ज़रूरी है , पढ़ना सीखना। बच्‍चे के चार साल का होते-न-होते उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्‍य यही होता है। इसी के लिए तमाम प्राथमिक शालायें , हजारों स्‍वयंसेवी संस्‍थायें , ढेर सारे प्रकाशक और पढ़ना सिखाने के नित नूतन नवाचार मौज़ूद हैं। बावज़ूद इसके हमारी शिक्षा की मुख्‍य समस्‍या आज भी बच्‍चों का पढ़ना नहीं सीख पाना या देरी से पढ़ना सीखना है। थोड़ा और गहराई से सोचें तो जिन्‍हें हम इस रूप में जानते हैं कि वे पढ़ना जानते हैं , वे भी कहाँ कायदे से पढ़ना सीखे होते हैं। कृष्‍ण कुमार की किताब पढ़ना , जरा सोचना हमें पढ़ने के इन्‍ही विविध पहलुओं की पड़ताल में ले जाती है। बल्कि ज्‍यादा सही ये कहना होगा कि ...

देश के जहाज में

 कोरोना की दूसरी लहर में हमने देखा कि कुछ पूँजीपति सपरिवार विदेश चले गए थे। 2019 में 7000 अमीर भारत छोड़कर विदेश चले गए। ये वे लोग हैं जिनको सरकार कौड़ियों के दाम पर जंगल, पानी और पहाड़ भेंट करती है। इनको हीरे मिल सकें, इसके लिए ही हमारे पेड़ काटे जाते हैं। बैंकें इन्ही के कर्जे माफ करती हैं। इससे मुझे फिल्म 2012 की याद आती है।इसमें कयामत की कल्पना की गई है। जिसमे अधिकांश लोग खत्म हो जाते हैं।  फिल्म में खास तरह के "जहाज" बनाकर कुछ चुने हुए लोगों को सारे देशों की सहमति से बचाया जाता है।  इन खास लोगों को चुनने का आधार सत्ता और पैसा होता है। मुझे ये फिल्मी जहाज देश या राष्ट्र का सटीक प्रतीक लगता है।  फिल्म में लाखों लोग जहाज में बैठने की जद्दोजहद और प्रार्थना करते नजर आते हैं। भारत में हम इनको आदिवासी, दलित, गरीब और साधनहीन लोग कह सकते हैं। जैसे-जैसे पूंजीवाद पसरता है। लोकोन्मुख राष्ट्रवाद की जगह सिकुड़ती जाती है। जहाज छोटा होता जाता है। चूँकि राजनीति फिल्म नहीं है, इसलिए बाकी लोगों को लगातार भरमाया जाता है कि जहाज सबके लिए है।  पर हम जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें जहा...

साबित करो कि सामान्य हो!

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 एक कहानी सुनाता हूँ।  एक चौदह साल की मूक वधिर लड़की है।  स्कूल में उन बच्चों के साथ पढ़ती है जो मूक वधिर नहीं हैं। उसके पिता सब्जी का ठेला लगाते हैं। उसकी कोई सहेली नहीं है। वो कक्षा में सबसे पीछे बैठती है। उसके अध्यापक लोग भी उस पर कोई ध्यान नहीं देते।  मूक वधिर लड़की एक दिन स्कूल की लड़कियों के साथ पिकनिक पर जाती है। पिकनिक नदी किनारे है। मूक वधिर लड़की इनसे दूर नदी किनारे उदास बैठी है। सब लड़कियाँ मज़े कर रही हैं। उनकी गेंद उछलती हुई आकर नदी में गिर जाती है। एक लड़की गेंद लेने नदी में उतरती है और पानी में डूबने लगती है। मूक वधिर लड़की उसे डूबने से बचाती है।  उस दिन से वह स्कूल में सबके ध्यान का केन्द्र बन जाती है। सारा शहर उसकी तारीफ़ करता है। यह एक पाठ्यपुस्तक से बरामद हुई रचना है। अन्यथा सक्षम बच्चों को पाठ्य्पुस्तकों और बच्चों  के साहित्ये में लाने का सुपरहिट फार्मूला है यह। इस लिजलिजी चीज़ की बुनावट समझिए। यह कहती है कि जो मूक वधिर नहीं है, वो सबके ध्यान और दोस्ती के स्वावभाविक केन्द्र  हैं। पर मूक वधिर लड़की जैसी है वैसी स्वीकार नहीं है। ...

काला और मैं

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  काला और मैं  मेरी झुग्‍गी सड़क के किनारे दो कच्‍चे नालों के बीच की जमीन पर है। पिछले दो साल में यहां कई नई झुग्गियां बन गई हैं। काला इन नई बनी झुग्गियों में से एक में रहता है।  काला से पहली मुलाकात की बात है। उस दिन मैं सुकड़ी और बंटा के साथ मार कुटाई खेल रहा था। काला के पिताजी और मां बांस की खपच्चियों से अपनी झोपड़ी के लिए छत बना रहे थे। पास में ही जमीन पर काला बैठा था। मैंने गेंद सुकड़ी को मारी। सुकड़ी गच्‍चा दे गई और गेंद धप्‍प से काला की पीठ पर जाकर लगी। काला ने पलटकर देखा, वो गुस्‍सा होने के बजाय मुस्‍कुरा रहा था।  मैंने पूछा- तू खेलेगा हमारे साथ। काला सकुचाते हुए उठा। उस दिन तो वो जानबूझकर सावधानी से गेंद मारता रहा, कहीं जोर से ना लग जाए। दूसरे दिन हमने फिर से मारकुटाई खेली। काला ने पूरी ताकत से ताक कर मुझे मारा। कपड़े की गेंद धप्‍प से मेरी पीठ पर लगी और हम दोस्‍त बन गए।  काला आठ साल का है। मैं दस साल का हूं। हम रात में टीवी पर साथ साथ पिक्‍चर देखते हैं। भूत की पिक्‍चर मुझे अच्‍छी लगती है। बड़े बड़े लोग कार से उतरकर किसी हवेली में जाते हैं। जब वो डर से क...

रंग

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दूसरा जूता

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पैसे कितने मिले?

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  जब कोई लिखता है कि उसे "अमुक" पुरस्कार मिला है। तो सबसे पहले मेरा मन उससे यह पूछने का करता है कि पैसे कितने मिले? थोड़ा और खोदने का मन करता है कि जिस रचना/किताब के लिए ईनाम मिला है उसके लिए छापक से मानदेय मिला था कि नहीं? मुफ्त में छपवाई थी? कि छपवाने के पैसे देने पडे थे? पर नहीं पूछता। आपका मन क्या करता है? नाममात्र का पुरस्कार लेखक के लिए नहीं है! वह ऐसा पुरस्कार है जो आयोजक खुद को दे रहे हैं। खुद का ढिंढोरा पीट रहे हैं! कितनी बुरी बात है कि कोई रचनाकार कहे कि मुझे इस महीने अमुक पुरस्कार मिला है, लेने जाने में दो दिन और आठ हजार लग गए। यह बुरी बात ही सच्ची बात है। पर कोई नहीं कहता। कौन कहेगा कि अपनी मरवाकर आया हूं। इसके बदले वह कहता है, मुझे अमुक पुरस्कार मिला। सब कहते हैं, वाह, बधाई, आपकी प्रतिभा का प्रतिदान है, आपको तो मिलना ही था। कितना नकली है ना यह सब?

पानी

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टर्राना

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वीरता या ....

  आपने बहादुरी की वे तस् ‍ वीरें देखी होंगी; जिनमें अकारण मार डाले गये शेर के शव के पीछे खड़े हुए लोग दिखते हैं। तस् ‍ वीर में हाँका लगाने वाले नहीं होते। ये अक् ‍ सर वे लोग होते हैं जो हाँका लगाने के लिए लोगों को खरीद सकते हैं, मसलन राजा, रानी और ज़मींदार। इसके लिए भी अक् ‍ सर बेगार करा ली जाती रही होगी! यह ज़माना गुज़र गया इसका पता तस् ‍ वीर के श् ‍ वेत-श् ‍ याम रंग से चलता है। पर निहत् ‍ थे शेर की हत् ‍ या को बहादुरी समझने वालों ने ऐसी तस् ‍ वीरे अब भी सहेज रखी हैं। इसका इन् ‍ तज़ाम भी कर रखा है कि हाँका लगाने वाले मिलते रहें। पिछले दिनों मैंने ऐसी एक तस् ‍ वीर देखी। संयोग से उसी दिन प्रभात की यह कविता भी पढ़ी- एक शेरनी भूखी थी मन से भी वो टूटी थी भैंसे उसे धकेलते थे गीदड़ पास टहलते थे घास नहीं खा सकती थी शिकार नहीं कर सकती थी तीन दिनों से भूखी थी हड्डी हड्डी दुखती थी डर ना होता अगर मुझे भेड़ा देता एक उसे शिकार की तस्वीर देखी और कविता पढ़ी तो ख् ‍ याल आया कि बहादुरी की तस् ‍ वीरें चारों और बिखरी पड़ी हैं। इनमें से किसे बहादुरी कहें। किसे हिंसा, दमन, पशुता, भेदभाव या मूर्खता कहें...

मुर्दे का वज़न

  बुआ का गांव नर्मदा पर बने बांध में डूबा हुआ है। बुआ मर चुकी। फूफा भी मर चुके। आज यादों में डुबकी लगाई तो फूफा की शवयात्रा याद आ गई। मैं हाईस्कूल में था। फूफा की खबर आई तो मुझे उनके गांव भिजा दिया। देर शाम पहुंचा। अगले दिन क्रियाकर्म था। पता चला फूफा की अन्तिम इच्छा नर्मदा किनारे दाग देने की थी। नर्मदा गांव से 18 किलोमीटर दूर थी। 'गांव डूबने वाला है' का पत्थर सबके गले में था। निपट गरीबों के इस गांव में एक भी ट्रेक्टर नहीं था। पैदल ही जाना था। शवयात्रा निकली तो चार पांच किलोमीटर बाद ही लोग थकने लगे। कंधे बदलने लगे और इसके लिए तू तू मैं मैं भी होने लगी। अर्थी जमीन पर रखकर सुस्ताने के लिए रुका जाने लगा। जमीन पर रखना, पटकने' में बदल गया। राम नाम सत्य करते लोग राम राम करने लगे। फूफाजी अब सिर्फ वजन थे। अपने भाइयों, बेटों, दोस्तों सबके लिए असहनीय बोझ। कल का दुख थकान और परेशानी में बदल गया था। यात्रा अब इस बोझ से मुक्ति के लिए थी। किसी तरह दोपहर तीन बजे नर्मदा किनारे लगे। सबको तेज भूख लगी थी। जाते ही नुक्ती और सेंव बनने लगी। फूफा में आग लगाते ही पंचलकडी भी दे दी गई। और सब खाने पर ...

भाषा का भ अ ष अ

  एक विद्वान कह रहे थे कि 'अमुक' भाषा ज्ञान की भाषा है। इस पर मुझे जो सूझा वह बताने की कोशिश करता हूं। मान लीजिए आपको सिर्फ कन्नड़ आती है। और चिकन बिरयानी बनाना भी आता है। आप बोलकर और लिखकर चिकन बिरयानी बनाने की विधि बता सकते हैं। फिर आप बस्तर में रहने लगते हैं। और हलबी भाषा सीख जाते हैं। तब आप हलबी में चिकन बिरयानी बनाने की विधि तो नहीं सीखेंगे। वह तो आपको आती है। भाषा बदलने से ज्ञान तो नहीं बदलेगा। फिर आप मलयालम, तेलुगू, अरबी, गोंडी, अंग्रेज़ी आदि जितनी भी भाषा सीखते जाएँगे। सब में चिकन बिरयानी बनाने की विधि लिखना बताना भी सीख ही जाएंगे। सीखते जाएँगे। इसलिए कोई भी भाषा किसी दूसरी भाषा से श्रेष्ठ या कमतर नहीं हैं। वे सिर्फ हैं कुदरत से इंसान को मिले अनूठे तोहफे की तरह। अगर कोई किसी भाषा को ज्ञान की भाषा कहता है तो उसे उसी भाषा को ज्ञान के अलावा अज्ञान, अंधविश्वास, विश्वास, कूड़ा, कचरा, अनुभव, विचार, इज़्म आदि की भाषा भी कहना पडेगा। क्योंकि सब कुछ भाषा में ही है।

अचार

  एक संशोधित साक्षात्कार -आप आम कैसे खाते हैं -एकदम से नहीं खाता। पहले ‘आ’ खाता हूँ फिर ‘म’। फिर पूरी भाषा खा जाता हूँ। बल्कि खा चुका हूँ । सिर्फ म और द बचा है। और देखो, मीडिया का काम इससे भी चल रहा है। हें हें हें हें!

अकबर की भाषा, जोधा की भाषा

  अकबर को गुस्सा आता है। जोधा क्रोधित होती है। अकबर को खुशी होती है। जोधा प्रसन्न् होती हैं। अकबर के पास दिल है, जो नाजुक है। जोधा के पास ह्रदय है, जो कोमल है। अकबर जोधा से गुफ्तगू करते हैं, जोधा भी अकबर से वार्तालाप करती हैं। दोनों एक दूसरे से अपनी अपनी भाषा में बात करते हैं। और दोनों एक दूसरे की बात समझते हैं। इससे पटकथा लेखक क्या यह समझाना चाहता था कि उस समय के भारत में हिन्दू और मुसलमान अलग−अलग भाषा बोलते थे? और अपनी−अपनी भाषा के प्रति लोगों के आग्रह इतने तगड़े थे कि जिन्दगी भर साथ रहकर भी उनकी भाषा पर एक−दूसरे का असर नहीं होता था? या वह हिन्दू या मुस्लिम होने की पहचान के रूप में भाषा को स्थापित कर रहा था? या वह मूर्ख था? और भाषाओं के बारे में कुछ भी नही जानता था!