देश के जहाज में

 कोरोना की दूसरी लहर में हमने देखा कि कुछ पूँजीपति सपरिवार विदेश चले गए थे। 2019 में 7000 अमीर भारत छोड़कर विदेश चले गए।

ये वे लोग हैं जिनको सरकार कौड़ियों के दाम पर जंगल, पानी और पहाड़ भेंट करती है। इनको हीरे मिल सकें, इसके लिए ही हमारे पेड़ काटे जाते हैं। बैंकें इन्ही के कर्जे माफ करती हैं।

इससे मुझे फिल्म 2012 की याद आती है।इसमें कयामत की कल्पना की गई है। जिसमे अधिकांश लोग खत्म हो जाते हैं। 

फिल्म में खास तरह के "जहाज" बनाकर कुछ चुने हुए लोगों को सारे देशों की सहमति से बचाया जाता है। 


इन खास लोगों को चुनने का आधार सत्ता और पैसा होता है।

मुझे ये फिल्मी जहाज देश या राष्ट्र का सटीक प्रतीक लगता है।

 फिल्म में लाखों लोग जहाज में बैठने की जद्दोजहद और प्रार्थना करते नजर आते हैं। भारत में हम इनको आदिवासी, दलित, गरीब और साधनहीन लोग कह सकते हैं।

जैसे-जैसे पूंजीवाद पसरता है। लोकोन्मुख राष्ट्रवाद की जगह सिकुड़ती जाती है। जहाज छोटा होता जाता है।


चूँकि राजनीति फिल्म नहीं है, इसलिए बाकी लोगों को लगातार भरमाया जाता है कि जहाज सबके लिए है। 

पर हम जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें जहाज लगातार छोटा होता जायेगा। 

हो सकता है कभी ऐसा भी समय आए कि जहाज इतना छोटा हो जाये कि उसमें सिर्फ 100 पूंजीपतियों और 100 सत्ताधारियों की जगह ही बचे। 

मुझे नहीं पता कि वो समय कितने साल दूर है! पर वह भविष्य में है जरूर।

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