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होना और रहना

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 होने और रहने के दो तरीके हैं! एक मेरी नींद 'सेवन सिस्टर्स' की तीखी आवाजों से खुली। आज चार दिन बाद धूप खिली है। हमें इसकी कीमत पता है फिर भी हम धूप में नहीं नहा रहे। गौरैया उनके लिए रखे चावल के दाने खाकर चली गई हैं। बताशा मकान की छत पर जाकर धूप में लोट लगा रही है। आज नए रोपे हरसिंगार में दो फूल आए हैं।  (यह आज का, अभी का दृश्य है जो मेरा है। मुझे इसी से खुशी या नाखुशी मिलनी चाहिए!) दो  पर इसी सुबह बहुत से लोग अपने आसपास से निकलकर देश दुनिया में चले जाते हैं। वहाँ एनडीए ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। चार पाँच लाख लोग अयोध्या में परिक्रमा लगा रहे हैं। सोफियाजी ने आपरेशन सिंदूर की तारीफ की है। आज मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस है। देश को नया सीजेआई मिलने वाला है! यह मेरे ऊपर है कि मैं अपने होने में उक्त दो दृश्यों में से किसको तवज्जो देता हूँ। किस बात से सहमत, असहमत होता हूँ। किस को संज्ञान में लेता हूँ? किस से सरोकार रखता हूँ। इस पर सोचना, शायद पता चले कि हम खुद के साथ क्या कर रहे हैं?

ऊँट और पहाड़

  रात में खाने के लिए होटल खोजता दिल्ली की कोई सड़क पैदल नाप रहा हूँ। सामने से एक दुबला पतला युवक ऊँट की नकेल हाथ में लिए पैदल चला आ रहा था। "जिनके पास ऊँट हों उन्हें पैदल ही चलना पड़ता है।" सड़क के दोनों तरफ की ऊँची ऊँची इमारतों के बीच चलता ऊँट पहाड़ के नीचे आया हुआ जैसा था। ऊँट के मालिक को ऊँट कहें तो सड़क पर चलती कारों के बीच वह भी पहाड़ के नीचे आया जैसा ही था। ऊँट और ऊँट वाला दोनों थके हुए थे। जब दोनों करीब से गुजरे तो देखा , ऊँट की पीठ पर एक सीढ़ी टँगी है। यह सवारी के लिए ऊँट की पीठ पर सवार होने को थी। सीढ़ी जैसे ग्राहक बुलाता एक विज्ञापन था, " मेरी पीठ पर सवारी करो। मैं पीठ तक पहुँचने की सीढ़ी अपने साथ रखता हूँ !" पर क्या यह सिर्फ ऊँट की बात है ? अगर कोई ऊँट हैं तो जो सीढ़ी उसने पीठ पर लाद रखी है, उस पर चलकर ऊपर जाने वाले भी हैं। यह ऊँट कवि है। इसकी सीढ़ी से होकर प्रकाशक ऊपर जाएगा। यह ऊँट श्रद्धालू है, काँवड़ उठाने के काम आएगा।   ऊँटों को पता ही नहीं है कि जो पहचान उन्होंने लाद रखी है। उसे दूसरे सीढ़ी बना सकते हैं। सवार हो सकते हैं, लदे रह सकते हैं। ...

बालकनी में बन्दर

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बाघ देखना

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  बाघ की कितनी सारी छवियाँ हैं। उसे जिसने भी देखा अपनी तरह से देखा। दिख गया बाघ किसी और को दिखने जंगल में रह गया। देखा हुआ बाघ एक कहानी बन कर हमारे साथ चला आया। कई लोगों को दिखा एक बाघ कई लोगों की कहानियों में रहता है। और बाघ देखने की सबकी कहानियाँ अलग-अलग होती हैं। हर बार दिखा बाघ एक अलग कहानी है। मैंने दूर से एक बाघ देखा है। वो गर्मी से बचने के लिए जंगल के एक नाले में बैठा था। मैं उसे देखकर लौट आया। और कई दिनों तक कल्पना में उसे देखता रहा।

तमीज से

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दोस्त के जूते [ उत्तरप्रदेश में कक्षा 3 की किताब 'वीणा' में शामिल]

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काम की चीज़

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आम के बगीचे में

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  कहानी - आम के बगीचे में  बकरी चराते-चराते राशिद ने देखा। आम के बगीचे में माली बाबा नहीं हैं। वो चुपके से बगीचे में घुसा और आम के सबसे ऊँ चे पेड़ पर चढ़ गया। राशिद आम तोड़ ही रहा था कि जाने किधर से माली बाबा आ टपके। दूर भी नहीं , आम के ठीक नीचे। राशिद कायदे से उतरता तो पकड़े जाने का खतरा था। उसने तय किया कि वो सीधे जमीन पर कूदेगा और दौड़ लगा देगा। माली बाबा ने राशिद को देख लिया था। राशिद जिधर से भी कूदने की कोशिश करता , माली बाबा भी फुर्ती से उसी तरफ हो जाते। राशिद कूदने की जुगत में बन्‍दर की तरह इस डाल से उस डाल पर कूदता रहा। हर बार माली बाबा भी इस पोजीशन में होते कि राशिद नीचे कूदे तो सीधे उनकी गिरफ्त में ही जाये। राशिद अब घबराने लगा था कि आज तो जमकर पिटाई होगी। कुछ देर तक यही आँख-मिचौनी चलती रही। माली बाबा ठहरे बुजुर्ग आदमी। इस कसरत से वे थक गए और एक जगह खड़े होकर हाँफने लगे। राशिद ने भी सोचा- यही मौका है। वो माली बाबा जहाँ थे , उसकी विपरीत दिशा में कूदा। पर यह क्‍या ? माली बाबा ने भी फुर्ती से जगह बदली और राशिद सीधा उनके हाथों में गिरा। वे राशिद को गोद में लिए लि...

घोड़ा

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पढ़ना; ज़रा सोचना!

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                                                      इंसान के एक बच्‍चे के समक्ष सीखने के लिए तमाम चीज़ें होती हैं। इनमें से कुछ साइकिल चलाना , तैरना , पेड़ पर चढ़ना , गाना , किसी वाद्य यंत्र को बजाने में महारत हासिल करना आदि हैं। इनमें सबसे न्‍यूनतम और बेहद ज़रूरी है , पढ़ना सीखना। बच्‍चे के चार साल का होते-न-होते उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्‍य यही होता है। इसी के लिए तमाम प्राथमिक शालायें , हजारों स्‍वयंसेवी संस्‍थायें , ढेर सारे प्रकाशक और पढ़ना सिखाने के नित नूतन नवाचार मौज़ूद हैं। बावज़ूद इसके हमारी शिक्षा की मुख्‍य समस्‍या आज भी बच्‍चों का पढ़ना नहीं सीख पाना या देरी से पढ़ना सीखना है। थोड़ा और गहराई से सोचें तो जिन्‍हें हम इस रूप में जानते हैं कि वे पढ़ना जानते हैं , वे भी कहाँ कायदे से पढ़ना सीखे होते हैं। कृष्‍ण कुमार की किताब पढ़ना , जरा सोचना हमें पढ़ने के इन्‍ही विविध पहलुओं की पड़ताल में ले जाती है। बल्कि ज्‍यादा सही ये कहना होगा कि ...

देश के जहाज में

 कोरोना की दूसरी लहर में हमने देखा कि कुछ पूँजीपति सपरिवार विदेश चले गए थे। 2019 में 7000 अमीर भारत छोड़कर विदेश चले गए। ये वे लोग हैं जिनको सरकार कौड़ियों के दाम पर जंगल, पानी और पहाड़ भेंट करती है। इनको हीरे मिल सकें, इसके लिए ही हमारे पेड़ काटे जाते हैं। बैंकें इन्ही के कर्जे माफ करती हैं। इससे मुझे फिल्म 2012 की याद आती है।इसमें कयामत की कल्पना की गई है। जिसमे अधिकांश लोग खत्म हो जाते हैं।  फिल्म में खास तरह के "जहाज" बनाकर कुछ चुने हुए लोगों को सारे देशों की सहमति से बचाया जाता है।  इन खास लोगों को चुनने का आधार सत्ता और पैसा होता है। मुझे ये फिल्मी जहाज देश या राष्ट्र का सटीक प्रतीक लगता है।  फिल्म में लाखों लोग जहाज में बैठने की जद्दोजहद और प्रार्थना करते नजर आते हैं। भारत में हम इनको आदिवासी, दलित, गरीब और साधनहीन लोग कह सकते हैं। जैसे-जैसे पूंजीवाद पसरता है। लोकोन्मुख राष्ट्रवाद की जगह सिकुड़ती जाती है। जहाज छोटा होता जाता है। चूँकि राजनीति फिल्म नहीं है, इसलिए बाकी लोगों को लगातार भरमाया जाता है कि जहाज सबके लिए है।  पर हम जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें जहा...

साबित करो कि सामान्य हो!

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 एक कहानी सुनाता हूँ।  एक चौदह साल की मूक वधिर लड़की है।  स्कूल में उन बच्चों के साथ पढ़ती है जो मूक वधिर नहीं हैं। उसके पिता सब्जी का ठेला लगाते हैं। उसकी कोई सहेली नहीं है। वो कक्षा में सबसे पीछे बैठती है। उसके अध्यापक लोग भी उस पर कोई ध्यान नहीं देते।  मूक वधिर लड़की एक दिन स्कूल की लड़कियों के साथ पिकनिक पर जाती है। पिकनिक नदी किनारे है। मूक वधिर लड़की इनसे दूर नदी किनारे उदास बैठी है। सब लड़कियाँ मज़े कर रही हैं। उनकी गेंद उछलती हुई आकर नदी में गिर जाती है। एक लड़की गेंद लेने नदी में उतरती है और पानी में डूबने लगती है। मूक वधिर लड़की उसे डूबने से बचाती है।  उस दिन से वह स्कूल में सबके ध्यान का केन्द्र बन जाती है। सारा शहर उसकी तारीफ़ करता है। यह एक पाठ्यपुस्तक से बरामद हुई रचना है। अन्यथा सक्षम बच्चों को पाठ्य्पुस्तकों और बच्चों  के साहित्ये में लाने का सुपरहिट फार्मूला है यह। इस लिजलिजी चीज़ की बुनावट समझिए। यह कहती है कि जो मूक वधिर नहीं है, वो सबके ध्यान और दोस्ती के स्वावभाविक केन्द्र  हैं। पर मूक वधिर लड़की जैसी है वैसी स्वीकार नहीं है। ...

काला और मैं

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  काला और मैं  मेरी झुग्‍गी सड़क के किनारे दो कच्‍चे नालों के बीच की जमीन पर है। पिछले दो साल में यहां कई नई झुग्गियां बन गई हैं। काला इन नई बनी झुग्गियों में से एक में रहता है।  काला से पहली मुलाकात की बात है। उस दिन मैं सुकड़ी और बंटा के साथ मार कुटाई खेल रहा था। काला के पिताजी और मां बांस की खपच्चियों से अपनी झोपड़ी के लिए छत बना रहे थे। पास में ही जमीन पर काला बैठा था। मैंने गेंद सुकड़ी को मारी। सुकड़ी गच्‍चा दे गई और गेंद धप्‍प से काला की पीठ पर जाकर लगी। काला ने पलटकर देखा, वो गुस्‍सा होने के बजाय मुस्‍कुरा रहा था।  मैंने पूछा- तू खेलेगा हमारे साथ। काला सकुचाते हुए उठा। उस दिन तो वो जानबूझकर सावधानी से गेंद मारता रहा, कहीं जोर से ना लग जाए। दूसरे दिन हमने फिर से मारकुटाई खेली। काला ने पूरी ताकत से ताक कर मुझे मारा। कपड़े की गेंद धप्‍प से मेरी पीठ पर लगी और हम दोस्‍त बन गए।  काला आठ साल का है। मैं दस साल का हूं। हम रात में टीवी पर साथ साथ पिक्‍चर देखते हैं। भूत की पिक्‍चर मुझे अच्‍छी लगती है। बड़े बड़े लोग कार से उतरकर किसी हवेली में जाते हैं। जब वो डर से क...

रंग

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दूसरा जूता

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पैसे कितने मिले?

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  जब कोई लिखता है कि उसे "अमुक" पुरस्कार मिला है। तो सबसे पहले मेरा मन उससे यह पूछने का करता है कि पैसे कितने मिले? थोड़ा और खोदने का मन करता है कि जिस रचना/किताब के लिए ईनाम मिला है उसके लिए छापक से मानदेय मिला था कि नहीं? मुफ्त में छपवाई थी? कि छपवाने के पैसे देने पडे थे? पर नहीं पूछता। आपका मन क्या करता है? नाममात्र का पुरस्कार लेखक के लिए नहीं है! वह ऐसा पुरस्कार है जो आयोजक खुद को दे रहे हैं। खुद का ढिंढोरा पीट रहे हैं! कितनी बुरी बात है कि कोई रचनाकार कहे कि मुझे इस महीने अमुक पुरस्कार मिला है, लेने जाने में दो दिन और आठ हजार लग गए। यह बुरी बात ही सच्ची बात है। पर कोई नहीं कहता। कौन कहेगा कि अपनी मरवाकर आया हूं। इसके बदले वह कहता है, मुझे अमुक पुरस्कार मिला। सब कहते हैं, वाह, बधाई, आपकी प्रतिभा का प्रतिदान है, आपको तो मिलना ही था। कितना नकली है ना यह सब?

पानी

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टर्राना

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वीरता या ....

  आपने बहादुरी की वे तस् ‍ वीरें देखी होंगी; जिनमें अकारण मार डाले गये शेर के शव के पीछे खड़े हुए लोग दिखते हैं। तस् ‍ वीर में हाँका लगाने वाले नहीं होते। ये अक् ‍ सर वे लोग होते हैं जो हाँका लगाने के लिए लोगों को खरीद सकते हैं, मसलन राजा, रानी और ज़मींदार। इसके लिए भी अक् ‍ सर बेगार करा ली जाती रही होगी! यह ज़माना गुज़र गया इसका पता तस् ‍ वीर के श् ‍ वेत-श् ‍ याम रंग से चलता है। पर निहत् ‍ थे शेर की हत् ‍ या को बहादुरी समझने वालों ने ऐसी तस् ‍ वीरे अब भी सहेज रखी हैं। इसका इन् ‍ तज़ाम भी कर रखा है कि हाँका लगाने वाले मिलते रहें। पिछले दिनों मैंने ऐसी एक तस् ‍ वीर देखी। संयोग से उसी दिन प्रभात की यह कविता भी पढ़ी- एक शेरनी भूखी थी मन से भी वो टूटी थी भैंसे उसे धकेलते थे गीदड़ पास टहलते थे घास नहीं खा सकती थी शिकार नहीं कर सकती थी तीन दिनों से भूखी थी हड्डी हड्डी दुखती थी डर ना होता अगर मुझे भेड़ा देता एक उसे शिकार की तस्वीर देखी और कविता पढ़ी तो ख् ‍ याल आया कि बहादुरी की तस् ‍ वीरें चारों और बिखरी पड़ी हैं। इनमें से किसे बहादुरी कहें। किसे हिंसा, दमन, पशुता, भेदभाव या मूर्खता कहें...