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पढ़ना: तथ्य और धारणा

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  किसी का लिखा पढता हूँ तो पढकर समझने के पहलू भी खुलते रहते हैं। कल 'किसी' की जीवनी पढते हुए एक वाक्य ने रोका। वाक्य था, "उनका जन्म सूफी संत ख्वाजा मोइनउद्दीन चिश्ती के शहर अजमेर में हुआ।" इस वाक्य में दो चीजें हैं, एक तथ्य और दूसरी धारणा। तथ्य यह है कि उनका जन्म अजमेर में हुआ। धारणा यह है कि अजमेर ख्वाजा मोइनउद्दीन चिश्ती का शहर है। हालाँकि यह भी एक तथ्य है। पर ऐसा तथ्य जो बदल भी सकता था! मसलन कोई लिख सकता था कि "उनका जन्म अनासागर झील के शहर अजमेर में हुआ।" इससे भी यही पता चलता कि उनका जन्म अजमेर में हुआ। धारणाओं से लेख में दी गई जानकारियों के साथ लेखिका के बारे में भी पता चलता है। ये उसकी पसंद, नापसंद, विश्वास, अंधविश्वास और देश दुनिया के बारे में समझ को दिखाती हैं। किसी कच्चे या लेखक के विचारों से सहमत पाठक को पढते हुए यह समझ नहीं आ सकता। जो ख्वाजा का मुरीद होगा, उसे तो यह वाक्य अच्छा ही लगेगा। विज्ञ पाठक पढ लेंगे कि यह पोस्ट ख्वाजा के बारे में नहीं है। यह पढकर मेरे मन में एक और वाक्य आया था, "उनका जन्म माँ गंगा के पवित्र शहर इलाहाबाद में हुआ था।...

वीरता के इलाके

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  आज काम करते हुए एक शब्द प्रयोग मिला, 'क्षेत्रीय वीरता।' मैंने यह प्रयोग पहली बार देखा। सोचा कि इसे कब कब प्रयोग कर सकते हैं! कुत्तों के लिए कहा जाता है "अपनी गली में कुत्ता भी शेर!" मतलब उनकी वीरता 'क्षेत्रीय वीरता' है। कुत्तों के बाद मुझे शिंदे के शिवसैनिक याद आए। वे किसी के भी खिलाफ उपद्रव महाराष्ट्र में ही कर सकते हैं! कर्नाटक में नहीं कर सकते। मतलब उनकी वीरता 'क्षेत्रीय वीरता' है। हम पाकिस्तान को धौंस दिखा सकते हैं। चीन के सामने भीगी बिल्ली बन जाते हैं। ऐसे देखें तो हमारी वीरता भी 'क्षेत्रीय वीरता' हुई। हालाँकि मुझे लगता है कि उपरोक्त उदाहरणों में आई बातें वीरता नहीं हैं। वीरता जान बचाने में है, सहिष्णु हो सकने में है, माफ कर देने में है। देखिए, शिक्षा की बात करते करते मैं क्या करने लगा। आप कहेंगे कि राजनीति करने लगा। कोई नहीं, राजनीति से कुछ भी अछूता नहीं है, शिक्षा की बात ठीक से कर पाना भी राजनीति ही है।

पेड़ क्या करते हैं?

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  शिक्षा ने बच् ‍ चों को बताया, पेड़ ऑक् ‍ सीजन देते हैं। उनसे हमें फल फूल और लकड़ी मिलती है। उसने किसी बच् ‍ चे को अपने आँगन, गली मोहल् ‍ ले के पेड़ की याद नहीं दि ‍ लाई। यह नहीं कहा कि उनका होना ही कितना सार्थक और खूबसूरत है। बच् ‍ चे पेड़ पर निबन् ‍ ध लिखते रहे। पर सचमुच के किसी दरख् ‍ त से कितने बच् ‍ चे जुड़े, पता नहीं! शिक्षित होकर भी हम ‘हरे’ नहीं हुए। ‘ठूँठ’ रह गए। जो पेडों से प्यार करते हैं उनकी शिक्षा अलग होती है.जंगल बचाने के काम के लिए पद्मश्री समेत कई पुरस् ‍ कारों से नवाज़ी गई जमुना टुडु से उसके बाबा बचपन से ही कहते रहे , “पेड़ों के पास होना अच् ‍ छा लगता है। उन् ‍ हें देखना। उनकी खुश् ‍ बू। उन् ‍ हें छूना। उन पर चिडि़यों को चहचहाते, घर बनाते देखना। उन पर कीड़ों, गिलहरियों, हवाओं बारिश का आना। तुम उन पर चढ़ जाती हो। उनके साथ खेलती हो। उन् ‍ हें गले लगाती हो। उनकी छाया में खेलती हो। यह कितना सुन् ‍ दर है ना!” इस शिक्षा के कारण जमुना पेड़ों को बचाने में जुटी। पेड़ का उदाहरण बताता है कि कई बार शिक्षा चीज़ों का उपयोग करना सिखाती है। उनसे जुड़ना नहीं सिखाती। जो शिक्षक सिखा...

ज्ञान

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ज्ञान  बुध्द को पेड के नीचे ज्ञान मिला। पेड के नीचे छाँव मिलती है। फूल और फल मिलते हैं। पक्षियों का कलरव मिलता है। पढाई का अफरा लगा हो, उसने आँख, नाक, कान सब बन्द कर दिए हों तो हरे पेड से आक्सीजन मिलती है और सूखे पेड से फर्नीचर। मुझे यहाँ 'महामारी' के लिए एक नया पद मिला। रायकवारजी बता रहे थे, यहाँ गोंड रहते थे, 'मरी पड़ी' तो भागकर अमुक खेडा में चले गये। वहाँ सौ सवा सौ साल रहे, फिर वहाँ भी 'मरी पड़ी' तो वहाँ से अमुक खेडा चले गये। 'महामारी' कुछ फिक्स जैसा फील कराती है। 'मरी पड़ी' में गतिशीलता है। यह आज है कल नहीं रहेगी। 

21 वीं सदी के स्किल्स

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आजकल शिक्षा में 21 वीं सदी की स्किल्स सिखाने पर जोर है। इसकी एक सूची यहाँ दी जा रही है- -वाट्स एप ग्रुप बनाना और एडमिन बनना। -रील्स बनाना। - बिना सोचे खुले मन से चीजें फारवर्ड करना। - अलग विचार रखने वालों को गाली देना। - वाहनों पर अपनी जाति और धर्म को प्रदर्शित करना। -अपनी जाति और धर्म पर गर्व करना और दूसरे के प्रति नफरत रखना। - ठेस खाने को बेताब आस्था का पालन करना। -कर्मकांडों और उससे जुडी चीजों और व्यवहार की वैज्ञानिकता की जानकारी रखना और उसे बता पाना। ( रोजे, उपवास, तिलक, बिन्दी, गोबर, गौमूत्र, विशिष्ट पायजामा, गमछा, टोपी आदि।) -सरकारों के हर निर्णय को सिर आँखों पर बिठाना। अभी तो इत्ती ही बूझ रही है। सूची मुकम्मल करने में आपका योगदान अपेक्षित है।

बिल्ली का डर

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 बिल्ली का डर  छोटे बच्चों को डर लगे तो वे अपने बडे की गोद में आकर आश्वस्त हो जाते हैं। कल छत की सेंटिंग्स खुल रही थी। लोहे की सेंटिंग्स के गिरने से तेज धमाके जैसी आवाज होती थी। हमारी बिल्ली बताशा बहुत डर रही थी। मैंने उसे गोद में ले लिया। इससे उसका डर कम नहीं हुआ। उसने चिल्लाकर खुद को छुडाया और दौडकर सोफे के नीचे घुस गई। बिल्ली को डर लगता है तो वो उसे दूर करने के लिए किसी दूसरे पर भरोसा नहीं करती। वह बिल्ली है, एक चेतनासम्पन्न जीव। उसके जिन्दा रहने के तरीके आदिम हैं। मैं कभी मजाक में उसका परिचय 'बताशा यादव' कहकर करवाता हूँ। पर उसकी कोई जाति नहीं! कोई धर्म नहीं! कोई राष्ट्र नहीं! बिल्ली का धर्म होता तो उसका कोई कबीला भी होता। तब कबीले की सरदार कहती, "अपना धर्म खतरे में है।" वह डरकर अपने धर्म के पीछे छिपती। अपने धर्म के पीछे छिपी बिल्ली को, दूसरे धर्म के पीछे छिपी बिल्ली से डर लगता! शुक्र है कि वह बिल्ली है, खालिस बिल्ली!

मामाजी के कुत्ते

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मामाजी खेती करते थे। खेत बड़ा था। वे कहते थे, "खेतों की रखवाली के लिए एक कुत्ता काफी नहीं है। मामाजी के पास एक से अधिक कुत्ते थे। वे इनको खेत के अलग-हिस्सों में तैनात करके रखते थे। जो भी खेत के करीब आता, कुत्ते उस पर भौंकने लगते। मामाजी ने इस दुनिया को एक आइडिया दिया। मैं बताता हूं, कैसे? मान लो ये देश एक बड़ा सा खेत है। और कोई समझता है कि वह खास उसी के समुदाय की बपौती है। तो वो क्या करेगा ? जो भी ये कहेगा कि ये देश सबका है। उसके साथ वो वही करेगा जो मामाजी के कुत्ते खेत के आसपास फटकने वाले के साथ करते थे। अब देखिए! देश किस तरह कुत्तों से आच्छादित हो गया है। वे महिलाओं की पैरवी करने वालों पर भौंकते हैं। दलित और आदिवासियों के हक की बात करने वाले पर भौंकते हैं। और तो और रेलों की लेटलतीफी, शिक्षा और नौकरी की मांग करने वालों पर भी भौंकते हैं। कई बार काट भी खाते हैं