ऊँट और पहाड़
रात में खाने के लिए होटल खोजता दिल्ली की कोई सड़क पैदल नाप रहा हूँ। सामने से एक दुबला पतला युवक ऊँट की नकेल हाथ में लिए पैदल चला आ रहा था। "जिनके पास ऊँट हों उन्हें पैदल ही चलना पड़ता है।" सड़क के दोनों तरफ की ऊँची ऊँची इमारतों के बीच चलता ऊँट पहाड़ के नीचे आया हुआ जैसा था। ऊँट के मालिक को ऊँट कहें तो सड़क पर चलती कारों के बीच वह भी पहाड़ के नीचे आया जैसा ही था। ऊँट और ऊँट वाला दोनों थके हुए थे। जब दोनों करीब से गुजरे तो देखा , ऊँट की पीठ पर एक सीढ़ी टँगी है। यह सवारी के लिए ऊँट की पीठ पर सवार होने को थी। सीढ़ी जैसे ग्राहक बुलाता एक विज्ञापन था, " मेरी पीठ पर सवारी करो। मैं पीठ तक पहुँचने की सीढ़ी अपने साथ रखता हूँ !" पर क्या यह सिर्फ ऊँट की बात है ? अगर कोई ऊँट हैं तो जो सीढ़ी उसने पीठ पर लाद रखी है, उस पर चलकर ऊपर जाने वाले भी हैं। यह ऊँट कवि है। इसकी सीढ़ी से होकर प्रकाशक ऊपर जाएगा। यह ऊँट श्रद्धालू है, काँवड़ उठाने के काम आएगा। ऊँटों को पता ही नहीं है कि जो पहचान उन्होंने लाद रखी है। उसे दूसरे सीढ़ी बना सकते हैं। सवार हो सकते हैं, लदे रह सकते हैं। ...