वीरता या ....
आपने बहादुरी की वे तस्वीरें देखी होंगी; जिनमें अकारण मार डाले गये शेर के शव के पीछे खड़े हुए लोग दिखते हैं। तस्वीर में हाँका लगाने वाले नहीं होते। ये अक्सर वे लोग होते हैं जो हाँका लगाने के लिए लोगों को खरीद सकते हैं, मसलन राजा, रानी और ज़मींदार। इसके लिए भी अक्सर बेगार करा ली जाती रही होगी!
यह ज़माना गुज़र गया इसका पता तस्वीर के श्वेत-श्याम रंग से चलता है। पर निहत्थे शेर की हत्या को बहादुरी समझने वालों ने ऐसी तस्वीरे अब भी सहेज रखी हैं। इसका इन्तज़ाम भी कर रखा है कि हाँका लगाने वाले मिलते रहें।
पिछले दिनों मैंने ऐसी एक तस्वीर देखी। संयोग से उसी दिन प्रभात की यह कविता भी पढ़ी-
एक शेरनी भूखी थी
मन से भी वो टूटी थी
भैंसे उसे धकेलते थे
गीदड़ पास टहलते थे
घास नहीं खा सकती थी
शिकार नहीं कर सकती थी
तीन दिनों से भूखी थी
हड्डी हड्डी दुखती थी
डर ना होता अगर मुझे
भेड़ा देता एक उसे
शिकार की तस्वीर देखी और कविता पढ़ी तो ख्याल आया कि बहादुरी की तस्वीरें चारों और बिखरी पड़ी हैं। इनमें से किसे बहादुरी कहें। किसे हिंसा, दमन, पशुता, भेदभाव या मूर्खता कहें, इसका विवेक कला और साहित्य से मिलेगा।
इससे दूर रहने वाले शेर की हत्या करने वाले और मगरमच्छ के बच्चे को पकड़ने वालों को ही ‘बहादुर’ समझते रहेंगे।
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