बात एक : कान कई !
"एक ही बात बच्चों से और बड़ों से अलग-अलग तरह से क्यों कही जाती है?"
कोंकणी में बच्चों के लिए लिख रहे चेतन आचार्य ने एक आयोजन में यह सवाल उठाया तो लगा कि बाल साहित्य के सन्दर्भ में यह सवाल करते रहा जाना चाहिए।
बच्चे ही क्यों हम एक ही बात, विचार, विषय कि मसले पर स्त्रियों से, दलितों से, आदिवासियों से और अल्पसंख्यकों से भी अलग-अलग तरह से पेश आते हैं। यह 'दोगलेपन' से कहीं ज्यादा है। इसके लिए एक नया शब्द प्रस्तुत करना पड़ेगा, 'बहुगलापन।'
हमारे बच्चे हमारे साथ रहते हैं। शहर में कर्फ्यू लग जाए तो उन्हें भी घर में कैद रहना पड़ता है। बरसात की बाढ़ उनका रास्ता भी रोकती है।
सूरज का आना-जाना, आसमान में चमकते चाँद तारे, नदियों की कलकल, फूलों के रंगो- बू !!!
क्या बच्चों और बड़ों के लिए अलग-अलग हैं?
बच्चे भी हाथी को हाथी, खरगोश को खरगोश और शेर को शेर समझते हैं।
और इन पर कहानी लिखने वाले शेर को जंगल का राजा बना देते हैं! हाथी की पीठ पर बस्ता रखकर उसे स्कूल पहुँचा देते हैं।
'स्कूल', वह भी अपनी घिसी-पिटी भूमिका में बच्चों के साथ ऐसा नत्थी है जैसे उनके जीवन में स्कूल के अलावा कुछ है ही नहीं!
Chetan Acharya जी की कोंकणी से चली बात कहाँ से कहाँ चली गई! कोंकणी एक भाषा है, जैसे हलबी, मलयालम, मराठी या कन्नड़ है। मुझे उसकी याद हिन्दी दिवस के सन्दर्भ में ही आई है।
कि आज हिन्दी का दिन है। परसाईजी कह गए हैं, दिवस कमजोरों का मनाया जाता है। थानेदार दिवस कौन मनाता है? हिन्दी की गरिमा और विस्तार में इजाफा हिन्दी बोलने और उसमें पढ़ने लिखने से होगा!
इससे भी ज़रूरी बात यह है कि आप अपनी भाषा का इस्तेमाल क्या कहने और लिखने के लिए करते हैं, उसमें गाली देते हैं कि गीत लिखते हैं!
आपकी भाषा में समावेश के तत्व अधिक हैं या वहिष्करण के?
उत्तर आपको पता है।
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