दानिशमन्द बडे

 पापा पूछते हैं।

 मम्मी पूछती है।

शिक्षक पूछते हैं। 

 क्या ये कहानी बच्चों को समझ आएगी?


समझने के बारे में समझने की जरूरत है।

समझना कोई मंजिल नहीं है। यह तो एक सिलसिला है। जैसे हम कहीं चलने के लिए निकल पडते हैं!


क्या कोई भी दावा कर सकता है कि वो कुछ भी एक बार में और पूरा-पूरा समझ गया!

आज जो समझा है कल वह संशोधित हो सकता है या पूरी तरह बदल सकता है।

यह बात बच्चों बड़ों सब पर लागू होती है।


"बच्चे नहीं समझेंगे",  कहने से पहले सोचियेगा!


क्या वयस्क सब कुछ समझते हैं?

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पढ़ना; ज़रा सोचना!

मैं भी समझ रहा हूँ

बिल्ली की धनतेरस