धिक्कार है तुम पर
कई लोग कद्दू नहीं खाते।
पर इस कारण वे कद्दू खाने वाले को हिकारत से नहीं देखने लगते।
ना ही किसी को गर्व से बताते हैं, "मैं कद्दू नहीं खाता।"
बस वे कद्दू नहीं खाते हैं।
जैसे नहीं खाकर वे समाज पर, अपनी कथित ऊंची जाति पर, धर्म पर अहसान कर रहे हों!
और यह मूढ़ता किस तरह पसरकर उन तबकों तक भी पहुंच जाती है जिनको मांस और अंडे सहज उपलब्ध हैं। जैसे मुर्गा बकरी पालने वाले वंचित लोग।
एक बार जगदलपुर में साथ खाना खाते हुए एक आदिवासी दोस्त ने मुझसे कहा, "हम अंडे तक नहीं खाते!" उसे लगा होगा कि यह सुनकर मैं उसके प्रति आदर से भर जाऊंगा।
पर मैंने उससे कहा, "धिक्कार है तुम पर!"
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