काला और मैं
काला और मैं
मेरी झुग्गी सड़क के किनारे दो कच्चे नालों के बीच की जमीन पर है। पिछले दो साल में यहां कई नई झुग्गियां बन गई हैं। काला इन नई बनी झुग्गियों में से एक में रहता है।
काला से पहली मुलाकात की बात है। उस दिन मैं सुकड़ी और बंटा के साथ मार कुटाई खेल रहा था। काला के पिताजी और मां बांस की खपच्चियों से अपनी झोपड़ी के लिए छत बना रहे थे। पास में ही जमीन पर काला बैठा था। मैंने गेंद सुकड़ी को मारी। सुकड़ी गच्चा दे गई और गेंद धप्प से काला की पीठ पर जाकर लगी। काला ने पलटकर देखा, वो गुस्सा होने के बजाय मुस्कुरा रहा था।
मैंने पूछा- तू खेलेगा हमारे साथ। काला सकुचाते हुए उठा। उस दिन तो वो जानबूझकर सावधानी से गेंद मारता रहा, कहीं जोर से ना लग जाए। दूसरे दिन हमने फिर से मारकुटाई खेली। काला ने पूरी ताकत से ताक कर मुझे मारा। कपड़े की गेंद धप्प से मेरी पीठ पर लगी और हम दोस्त बन गए।
काला आठ साल का है। मैं दस साल का हूं। हम रात में टीवी पर साथ साथ पिक्चर देखते हैं। भूत की पिक्चर मुझे अच्छी लगती है। बड़े बड़े लोग कार से उतरकर किसी हवेली में जाते हैं। जब वो डर से कांपते हैं तो ठण्ड की रातें याद आती हैं, जिसमें हम कांपते हुए सिकुड़कर सोने की कोशिश करते हैं। या भूखे पेट सोने की कोशिश करना याद आता है।
कार वाले लोग सिर्फ भूत से डरते हैं। उनको किसी और से क्यों डर लगेगा?
एक दिन मैं काला के घर पर था। तब मैंने कहा- मुझे भूत से डर लगता है। काला के पापा ने सुना तो बोले- हमको तो बहुत सी चीजों से डर लगता था। ठण्ड से, बरसात से, आंधी से, बीमारी से। जंगली जानवरों से भी डर लगता था। ठीक से पता ही नहीं था कि किससे डर लगना चाहिए।
पता तो तब चला जब हमारी जमीन के नीचे कोयला निकल आया।
अब तो किसी से भी डर नहीं लगता।
काला के पिता अजीब आदमी हैं। गुमसुम रहते हैं। मुझे उनकी पूरी बात समझ नहीं आई। उनके गांव को खाली कराकर वहां कोयले की खदान बना ली गई थी। शायद वे उसी के बारे में बोल रहे थे।
काला की मां किसी से कुछ नहीं बोलती। चुपचाप रहकर घर के काम करती रहती है।
काला कहता है कि मैं बहुत बक-बक करता हूं। ये सच नहीं है। उसकी बात हमसे अलग है। वो हाथी को टी बोलता है। पिता को बा और पानी को डा बोलता है। उसे अगर कहना हो- चलो, तो कहेगा बो। वो कई बातों के लिए एक-एक अक्षर से काम चला लेता है। काला को मेरा बोलना बक-बक तो लगेगा ही।
हम एक सरकारी स्कूल में साथ - साथ पढ़ने जाते हैं। काला को पढ़ना नहीं आता।
में सुबह बहुत जल्दी उठकर बीनने जाता हूं। प्लास्टिक, लोहा, कांच की बोतल जो भी मिले, सब उठा लेता हूं। नये साल पर, और होली के समय दारू की बातलें खूब मिलती हैं। इनसे अच्छी कमाई हो जाती है। कभी- कभी बोतलों के पास ही बचा खुचा नमकीन भी मिल जाता है।
मैं काला से भी साथ चलने का कहता हूं। काला के पापा ने उसे ऐसे काम के लिए मना कर रखा है। पर कितने दिन? शुरु शुरु में सब ऐसा ही सोचते हैं।
एक दिन मैंने काला को बताया- बाजार के पास वाली कालोनी में जो कचरे का डिब्बा है, उसमें से बहुत सारी काम की चीजें मिल जाती हैं। तुम बीनने क्यों नहीं चलते। क्या तुम पहले कभी भी बीनने नहीं गए।
काला पास की एक इमारत को देखते हुए बोला- मैं महुआ बीनने जाता था। कहकर काला चुप हो गया। इतना चुप कि मैं कुछ कहता तो उसके कान तक शायद ही पहुंचता। हम दोनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए देर तक चुपचाप खड़े रहे। आसपास से चीं चीं पों पों करती हुई गाडि़यां गुजरती रही।
मैं सोचता रहता हूं, काला मेरे जैसा क्यों नहीं है।
मेरे पिताजी बताते हैं कि वो भी मेरे दादा के साथ किसी गांव से उजड़कर यहां आए थे। वहां हरा भरा जंगल था। चारों तरफ चारौली, सागौन, आम, जामुन और महुआ के पेड़ थे। गांव में मेरे दादा भी हमारे साथ रहते थे। अब तो उनको मरे बहुत दिन हो गए। जब तक दादा जिन्दा थे, वो भी महुआ बीनने जाते थे।
काला मेरे दादा जैसा है।

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