सुई और गुब्बारे

 मेरे आसपास बहुत से गुब्बारे हैं।








हमारे आसपास कई गुब्बारे हैं।
किसी में झूठे इतिहास की हवा भरी है।
किसी में मिथ्या गर्व की।
कुछ गुब्बारे इतने पुराने हैं कि उनके भीतर की हवा सड़ चुकी है।
इनसे से किसी में स्त्री द्वेष की हवा है।
किसी में ऊंच नीच की।
किसी में पाखंड की। अंधविश्वास की।
बहुत से, खासकर बच्चों के लिए लिखने वाले लोग अभी तक इन्हें फुलाए जा रहे हैं।
क्या आप अपने बच्चों को ये गुब्बारे देना चाहेंगे?
फर्ज करो कि भाषा एक सुई है। तो क्या आप उससे इन गुब्बारों की हवा निकालना चाहेंगे!
इससे फर्क नहीं पड़ता कि सुई लोकल हो कि राष्ट्रीय? उसका नाम मराठी हो, कि हल्बी या हिन्दी!
उसे कोई भी नाम दो वह काम सुई का ही करेगी।
फर्क इससे पड़ता है कि आप सुई का क्या इस्तेमाल करते हैं?
हमारे ताने बाने फाड़े और उधेडे जा रहे हैं। सुई से इन्हें सिला भी जा सकता है! और बेमेल तागे जोडकर इन्हें और खराब भी किया जा सकता है!
अपने आप से पूछिये। आप सुई से क्या कर रहे हैं?
राजा की टोपी में मोती तो नहीं टांक रहे?

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