इंसान के एक बच्चे के समक्ष सीखने के लिए तमाम चीज़ें होती हैं। इनमें से कुछ साइकिल चलाना , तैरना , पेड़ पर चढ़ना , गाना , किसी वाद्य यंत्र को बजाने में महारत हासिल करना आदि हैं। इनमें सबसे न्यूनतम और बेहद ज़रूरी है , पढ़ना सीखना। बच्चे के चार साल का होते-न-होते उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्य यही होता है। इसी के लिए तमाम प्राथमिक शालायें , हजारों स्वयंसेवी संस्थायें , ढेर सारे प्रकाशक और पढ़ना सिखाने के नित नूतन नवाचार मौज़ूद हैं। बावज़ूद इसके हमारी शिक्षा की मुख्य समस्या आज भी बच्चों का पढ़ना नहीं सीख पाना या देरी से पढ़ना सीखना है। थोड़ा और गहराई से सोचें तो जिन्हें हम इस रूप में जानते हैं कि वे पढ़ना जानते हैं , वे भी कहाँ कायदे से पढ़ना सीखे होते हैं। कृष्ण कुमार की किताब पढ़ना , जरा सोचना हमें पढ़ने के इन्ही विविध पहलुओं की पड़ताल में ले जाती है। बल्कि ज्यादा सही ये कहना होगा कि ...
"मुझे नहीं मालूम। पता करके बताऊंगा।" उत्तर मालूम न होने पर, या आधा अधूरा पता होने पर बच्चे के सवाल का यह सबसे अच्छा उत्तर है। इससे उनको पता चलता है कि कोई भी सब कुछ नहीं जानता। जानने के लिए पता करना पड़ता है। अध्यापक और अभिभावक सब कुछ नहीं जान सकते ! या गलत जानते हो सकते हैं। पर बड़ों से "मुझे नहीं मालूम" ना सुनने वाले बच्चे उनकी बात को ही परम सच मान लेते हैं। मैं गलत बात को सही मानने पर अड़े कुछ बच्चों से मिला हूं। उनका तर्क होता है, "यही सही है। हमारी टीचर ने बताया है।"
बत्तू आज कुछ नहीं खरीदेगी! उसका सारा धन उसका 'अभी' है। एक आरामदायक सोफा और छत पर धरती की तरह घूमता पंखा। यह जितना होना चाहिए उतने से न रत्तीभर कम है न ज्यादा। कभी यह धन एक चिड़िया है! कभी दीवार पर टहलती एक छिपकली। बत्तू इनको घंटों अपलक निहारती रह सकती है! कभी उसका अभी का धन कटोरी में परोसी गई थोड़ी सी मलाई है! क्या अभी को जीने से बड़ा धन भी कोई होता होगा! आज बाजार चीजों से सजा है। पैसे हैं तो खरीदो। नहीं हैं तो उधार लेकर, क्रेडिट कार्ड से खरीदो! आज पूंजी, धर्म, परम्परा, ज्योतिष सब एकमत से कह रहे हैं, "आज खरीदारी का शुभ मुहूर्त है।" क्या आपको कोई ऐसी धनतेरस याद है जब कहा गया हो, "आज खरीदारी करना शुभ नहीं है?"
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