बत्तू आज कुछ नहीं खरीदेगी! उसका सारा धन उसका 'अभी' है। एक आरामदायक सोफा और छत पर धरती की तरह घूमता पंखा। यह जितना होना चाहिए उतने से न रत्तीभर कम है न ज्यादा। कभी यह धन एक चिड़िया है! कभी दीवार पर टहलती एक छिपकली। बत्तू इनको घंटों अपलक निहारती रह सकती है! कभी उसका अभी का धन कटोरी में परोसी गई थोड़ी सी मलाई है! क्या अभी को जीने से बड़ा धन भी कोई होता होगा! आज बाजार चीजों से सजा है। पैसे हैं तो खरीदो। नहीं हैं तो उधार लेकर, क्रेडिट कार्ड से खरीदो! आज पूंजी, धर्म, परम्परा, ज्योतिष सब एकमत से कह रहे हैं, "आज खरीदारी का शुभ मुहूर्त है।" क्या आपको कोई ऐसी धनतेरस याद है जब कहा गया हो, "आज खरीदारी करना शुभ नहीं है?"
मछली जल की रानी है अब यह बात पुरानी है इसकी पहली लाइन गुज़रा हुआ ज़माना है। और दूसरी आज का दौर। यह कितनी सरल सी बात थी। पर सालों साल किसी को नहीं बूझी। कबीले गए। राजतंत्र गया। सामंतवाद गया। कि अब तो लोकतंत्र भी जाने जाने को है। दुनिया बदलती रही। पर बच्चों के लिए लिखने वाले नहीं बदले। ज़्यादातर पहली लाइन की लीक पर ही चलते रहे। क्या बदलना चाहिए था? कैसे बदलना चाहिए था? इसकी कुछ झलक पराग में मिली। कुछ चकमक, साइकिल और प्लूटो आदि में मिलती है। और सुशील शुक्ल की रचनाओं में भी मिलती है। सुशील शुक्ल की रचनाएँ पढेंगे तो इसका रेशा रेशा पता चलेगा। यहाँ अर्ली रीडर्स के लिये लिखी रचनाओं की परास भी खाँटी रीडर्स तक जाती है। उनमें भाषा, कथ्य और कहन का ऐसा बेजोड़ सम्मिलन मिलता है कि वह सबके लिये हो जाती है। मुकम्मल साहित्यिक रचना। हम बार बार कहते रहे हैं कि “बच्चे ही तो हैं” मानकर लिखा गया कुछ भी नहीं चलेगा। उनसे बराबरी, गरिमा और बुध्दिमता से पेश आइये। उनको सिखाने की कोशिश मत कीजिये। बात कीजिये उनसे। वे वयस्कों से उम्र और अनुभव में छोटे हैं। पर कल्पनाशीलता के मामले में बहुत बड़े हैं।...
कहानी - आम के बगीचे में बकरी चराते-चराते राशिद ने देखा। आम के बगीचे में माली बाबा नहीं हैं। वो चुपके से बगीचे में घुसा और आम के सबसे ऊँ चे पेड़ पर चढ़ गया। राशिद आम तोड़ ही रहा था कि जाने किधर से माली बाबा आ टपके। दूर भी नहीं , आम के ठीक नीचे। राशिद कायदे से उतरता तो पकड़े जाने का खतरा था। उसने तय किया कि वो सीधे जमीन पर कूदेगा और दौड़ लगा देगा। माली बाबा ने राशिद को देख लिया था। राशिद जिधर से भी कूदने की कोशिश करता , माली बाबा भी फुर्ती से उसी तरफ हो जाते। राशिद कूदने की जुगत में बन्दर की तरह इस डाल से उस डाल पर कूदता रहा। हर बार माली बाबा भी इस पोजीशन में होते कि राशिद नीचे कूदे तो सीधे उनकी गिरफ्त में ही जाये। राशिद अब घबराने लगा था कि आज तो जमकर पिटाई होगी। कुछ देर तक यही आँख-मिचौनी चलती रही। माली बाबा ठहरे बुजुर्ग आदमी। इस कसरत से वे थक गए और एक जगह खड़े होकर हाँफने लगे। राशिद ने भी सोचा- यही मौका है। वो माली बाबा जहाँ थे , उसकी विपरीत दिशा में कूदा। पर यह क्या ? माली बाबा ने भी फुर्ती से जगह बदली और राशिद सीधा उनके हाथों में गिरा। वे राशिद को गोद में लिए लि...
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