पढ़ना; ज़रा सोचना!
इंसान के एक बच्चे के समक्ष सीखने के लिए तमाम चीज़ें होती हैं। इनमें से कुछ साइकिल चलाना , तैरना , पेड़ पर चढ़ना , गाना , किसी वाद्य यंत्र को बजाने में महारत हासिल करना आदि हैं। इनमें सबसे न्यूनतम और बेहद ज़रूरी है , पढ़ना सीखना। बच्चे के चार साल का होते-न-होते उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्य यही होता है। इसी के लिए तमाम प्राथमिक शालायें , हजारों स्वयंसेवी संस्थायें , ढेर सारे प्रकाशक और पढ़ना सिखाने के नित नूतन नवाचार मौज़ूद हैं। बावज़ूद इसके हमारी शिक्षा की मुख्य समस्या आज भी बच्चों का पढ़ना नहीं सीख पाना या देरी से पढ़ना सीखना है। थोड़ा और गहराई से सोचें तो जिन्हें हम इस रूप में जानते हैं कि वे पढ़ना जानते हैं , वे भी कहाँ कायदे से पढ़ना सीखे होते हैं। कृष्ण कुमार की किताब पढ़ना , जरा सोचना हमें पढ़ने के इन्ही विविध पहलुओं की पड़ताल में ले जाती है। बल्कि ज्यादा सही ये कहना होगा कि ...
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